करवा चौथ व्रत आज, जानें- क्या रहेगा पूजन और चांद को अर्घ्य देने का शुभ मुहूर्त।

सौभाग्य के महापर्व पर सुहागिनों का ‘सरगी’ के साथ निर्जला उपवास शुरू।

पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और सुख समृद्धि के लिए किया जाता है करवा चौथ व्रत।

प्रवाह ब्यूरो
लखनऊ। करवा चौथ आज सिद्धि योग में मनाया जा रहा है। जहां सुहागन महिलाएं सरगी करके सूर्योदय के समय से ही निर्जला व्रत हैं। आज प्रदोष काल में करवा चौथ पूजा होगी, जिसमें करवा की कथा सुनी जाएगी। यह व्रत सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय तक यानी चंद्रमा को अर्घ देने तक बिना अन्न और जल के रखना होता है। करवा चौथ का व्रत पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और सुख समृद्धि के लिए रखा जाता है। आज करवा चौथ शुक्रवार के दिन है ज्योतिष के अनुसार शुक्र को भौतिक सुख सुविधा, प्रेम, सुखी वैवाहिक जीवन आदि का कारक माना जाता है। सिद्ध योग में शुरू हुआ करवा चौथ व्रती महिलाओं के मनोकामनाओं की पूर्ति में भी सहायक है।
करवा चौथ पर सुहागिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर पूजा-अर्चना करती हैं। शास्त्रों के अनुसार करवा चौथ पर व्रत पूर्ण होने से पूर्व यौन संबंध बनाना उचित नहीं माना जाता है, क्योंकि इससे व्रत की पूर्णता प्रभावित होती है। हिंदू धर्म में करवा चौथ का त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता रहा है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह व्रत सबसे जरूरी माना जाता है और इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर पूजा-अर्चना करती हैं। यह त्यौहार पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं सूर्योदय से लेकर चंद्र दर्शन तक निर्जला व्रत रखती हैं। पश्चिमी यूपी में आज चांद निकलने का समय 8.24 PM है। पंचांग के अनुसार भी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 9 अक्टूबर को रात 10:54 बजे आरंभ होगी और 10 अक्टूबर को रात 7:38 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार भी 10 अक्टूबर को ही करवा चौथ व्रत रखना उचित है। साथ ही इस वर्ष करवा चौथ व्रत का शुभ मुहूर्त भी 10 अक्टूबर 2025 की शाम 5:57 बजे से 7:11 बजे तक रहेगा। इस समय में पूजा, कथा और व्रत संबंधी अनुष्ठान सबसे अधिक प्रभावी और शुभ माने जाते हैं। साथ ही पंचांग के अनुसार भी आज चंद्रोदय समय रात 8:14 बजे है।
करवा चौथ का त्यौहार भारतीय विवाहित महिलाओं के लिए बेहद खास होता है। यही कारण हैं कि करवा चौथ को लेकर कई तरह की मान्यताएं और रीति-रिवाज प्रचलित हैं।
इस दिन पत्नी अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे जीवन की कामना करते हुए व्रत रखती है। यह व्रत सूर्योदय से चंद्रमा निकलने तक चलता है। जब रात में चांद निकलता है, तो पत्नी चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपने पति का चेहरा देखकर ही व्रत तोड़ती है।
व्रत की शुरुआत सुबह-सुबह ‘सरगी’ से होती है, जो कि सास या परिवार की बड़ी महिलाएं व्रती महिला को देती हैं। सरगी में फल, सूखे मेवे, मिठाइयां, हल्का भोजन और कभी-कभी परंपरागत पकवान भी शामिल होते हैं। यह सरगी न केवल शरीर को ऊर्जा देती है, बल्कि यह सास-बहू के रिश्ते में भी आत्मीयता और आशीर्वाद का भाव जोड़ती है। सरगी न सिर्फ एक साधारण भोजन है, बल्कि इसमें गहरी धार्मिक भावना और पारिवारिक संबंधों की मिठास भी छिपी होती है। सरगी का मुख्य उद्देश्य शारीरिक ऊर्जा प्रदान करना है।  सरगी सास द्वारा बहू को दी जाती है, जो आशीर्वाद और स्नेह का प्रतीक मानी जाती है। इसे ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय से पहले खाया जाता है, जिससे व्रती महिला दिनभर बिना जल और अन्न के उपवास रख सके। धार्मिक दृष्टि से सरगी सिर्फ ऊर्जा देने वाला भोजन नहीं, बल्कि यह पति की लंबी उम्र, घर में सुख-शांति और सास-बहू के रिश्ते में प्रेम और विश्वास की डोर को मजबूत करने वाली परंपरा भी है।

◆ आखिर कैसे शुरू हुई थी ‘सरगी’ की परंपरा ?

सरगी की शुरुआत को लेकर दो प्रमुख कथाएं प्रचलित हैं, जो इसके धार्मिक व पौराणिक महत्व को दर्शाती हैं।

पहली कथा माता पार्वती से जुड़ी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब माता पार्वती ने भगवान शिव की दीर्घायु और कल्याण के लिए पहली बार करवा चौथ का व्रत रखा था, तब उनकी सास जीवित नहीं थीं। ऐसे में उनकी मां मैना देवी ने उन्हें व्रत से पहले सरगी दी थी एक विशेष थाली जिसमें पौष्टिक और शुभ खाद्य पदार्थ थे। तभी से यह परंपरा बनी कि यदि सास जीवित न हों, तो मायके से मां भी सरगी भेज सकती हैं।

दूसरी कथा महाभारत काल से जुड़ी है। कहा जाता है कि जब द्रौपदी ने पांडवों की रक्षा और दीर्घायु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था, तब उनकी सास कुंती ने उन्हें सरगी दी थी। इस प्रसंग से यह मान्यता और भी प्रबल हो गई कि सरगी ससुराल पक्ष की ओर से दी जानी चाहिए। खासकर सास की ओर से, जो इसे आशीर्वाद और प्रेम के रूप में अपनी बहू को देती है।
ये दोनों कथाओं से स्पष्ट करतीं है कि सरगी की परंपरा सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि यह आस्था, मातृत्व, और पारिवारिक रिश्तों की मिठास का प्रतीक है, जो पौराणिक काल से ही चली आ रही है।

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