मैथिली ठाकुर चुनाव जीतेंगी या नहीं…क्या कहते हैं समीकरण?

मैथिली का नाम आने के बाद से ही स्थानीय बीजेपी नेताओं में दिखी असंतुष्टि।

भाजपा ने बिहार में दरभंगा जिले की अलीनगर विधानसभा सीट से मैथिली को बनाया है अपना प्रत्याशी।

प्रवाह ब्यूरो
दरभंगा। भाजपा ने बिहार में दरभंगा जिले की अलीनगर विधानसभा सीट स लोक गायिका मैथिली ठाकुर को अपना प्रत्याशी बनाया है।
अब मशहूर फोक सिंगर मैथिली ठाकुर का पॉलिटिकल डेब्यू बिहार के चुनावी रण में नया रंग भर सकता है। मैथिली को टिकट मिलने के बाद से ही बिहार की राजनीति में उथल-पुथल मची हुई है। जिसके चलते ही अलीनगर विधानसभा में महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव की संभावनाओं के बीच बीजेपी ने मैथिली को टिकट देकर एक बड़ा दांव खेला है। पार्टी में एक दिन पहले बतौर सदस्य ज्वाइन करने वाली मैंथिली पर बीजेपी ने बड़ा भरोसा जताया है। हालांकि, इस सीट के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो राह इतनी आसान नहीं समझ आती। दरअसल, दरभंगा जिले के अंतर्गत आने वाले इस निर्वाचन क्षेत्र में ब्राह्मण, यादव और मुस्लिम समुदाय से जुड़े मतदाता प्रमुख तौर पर चुनावी खेल को बदलते हैं।
वहीं अलीनगर से मैथिली की जीत-हार को लेकर भी सियासी गलियारों में अटकलें लगाई जा रही हैं। अब जो भी हो मैथिली तो बीजेपी जॉइन कर चुकी है और पार्टी ने उन्हें मौजूदा विधायक मिश्री लाल यादव का टिकट काटकर दरभंगा जिले की अलीनगर विधानसभा सीट से उम्मीदवार भी घोषित कर दिया है।
जिसके चलते ही मैथिली का नाम आने के बाद से ही स्थानीय बीजेपी नेताओं में असंतुष्टि दिख रही है।
किन्तु सियासी गलियारों में चर्चा है कि आखिर बीजेपी ने मैथिली पर दांव क्यों खेला और क्या वे चुनाव जीत पाएंगी या नहीं?
सियासी समीकरण देखें तो अलीनगर पूर्व से ही आरजेडी का गढ़ माना जाता रहा है जिसके चलते ही साल 2010 और 2015 में यहां से आरजेडी के अब्दुल बारी सिद्दीकी चुनाव जीतकर विधायक बने थे, वहीं 2020 में वीआईपी की टिकट से मिश्री लाल यादव ने चुनाव जीता था, लेकिन एक मामले में दो साल सजा होने के बाद उनकी विधायकी छिन गई थी। जिस वजह से यहां बीजेपी की छवि थोड़ी धूमिल हुई थी यही कारण है कि इस बार बीजेपी को इस सीट को बरकरार रखने के लिए एक मजबूत व साफ छवि वाला कैंडिडेट चाहिए था। क्योंकि मैथिली बिहार में काफी मशहूर हैं और नया यंग फेमस फेस भी हैं, इसलिए बीजेपी ने उन पर दांव खेला है।
दूसरी ओर, कहा जा रहा है कि अलीनगर में 15-20% ब्राह्मण, 20-25% यादव और 25-30% मुस्लिम वोटर्स हैं। वहीं ब्राह्मणों और मुस्लिमों का गठजोड़ होने के साथ-साथ यादव वोटों का ध्रुवीकरण भी चुनावी जीत में अहम भूमिका निभाता है, ऐसे में अगर मैथिली ब्राह्मण और मुस्लिम वोट हासिल कर लेती है तो चुनाव में जीत संभव है, अन्यथा आरजेडी की मजबूत पकड़ कड़ी टक्कर देगी और मैथिली को हार का सामना करना पड़ सकता है, जो एनडीए के लिए बडा झटका होगा। बता दें कि 2020 के चुनाव में ब्राह्मण वोट बैंक आरजेडी के साथ चला गया था और मिश्री लाल यादव विधायक बन गए थे। हालांकि वे बाद में भाजपा में आ गए थे, लेकिन उनकी जीत में यादवों के साथ-साथ ब्राह्मणों ने भी निर्णायक भूमिका निभाई थी। इसलिए बीजेपी इस बार अलीनगर से ब्राह्मण उम्मीदवार पर दांव खेलना चाहती थी। क्योंकि मैथिली ब्राह्मण हैं और लोकगायिका होने के नाते हर वर्ग में मशहूर हैं तो वे सभी जातियों की महिलाओं का दिल जीत सकती हैं। मैथिली को पहली चुनौती आरजेडी उम्मीदवार से मिल सकती है, क्योंकि आरजेडी साल 2010 और साल 2015 में लगातार दो बार इस सीट से चुनाव जीत चुकी है। वहीं अलीनगर का मुस्लिम-यादव गठजोड़ भी आरजेडी के पक्ष में ही जाता है और यह समीकरण आरजेडी के लिए काफी मजबूत है। दूसरी चुनौती, आंतरिक विरोध होगा, क्योंकि अलीनगर के बीजेपी नेताओं ने मैथिली को बाहरी बताते हुए विरोध किया और स्थानीय नेता संजय सिंह उर्फ पप्पू भइया का समर्थन किया। तो वहीं मैथिली को नया चेहरा और राजनीतिक अनुभव की कमी भी तीसरी बडी चुनौती हो सकती है।
परिसीमन प्रक्रिया के बाद साल 2008 में बनी अलीनगर विधानसभा सीट में अलीनगर, तरडीह, घनश्यामपुर और मोतीपुर पंचायत जैसे क्षेत्र शामिल हैं, जो दरभंगा मुख्यालय से लगभग 38 किलोमीटर पूर्व में स्थित हैं। उचित सड़क संपर्क होने के बावजूद, यह क्षेत्र अपर्याप्त बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक परिवहन से जूझ रहा है, जिससे इसकी अविकसित छवि बनी हुई है। इस सीट पर अन्य जातियों और समुदाय गेम चेंजर साबित हो रहे हैं। यहां महिला मतदाताओं की एक बड़ी संख्या है। कुल 2.84 लाख मतदाताओं में लगभग 1.35 लाख महिला वोटर हैं, जो आगामी चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। जिसकी चलते ही मैंथिली का लोकगायिका होने के साथ-साथ महिला प्रत्याशी होना अलीपुर में पक्षधर साबित हो सकता है।

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