सुदामा चरित्र की करुणा और परीक्षित मोक्ष की महिमा संग संपन्न हुई श्रीमद् भागवत कथा।

◆ कथा सुन भाव विभोर हुए श्रोतागण, तालियों के साथ मिला सरानीय आर्थिक सहयोग।

◆ अद्भुत प्रसंगों के बीच हिमांशु भारद्वाज के भजनों ने बांधा समां।

प्रवाह ब्यूरो
संभल। शिव मंदिर कृतिया में श्री राम सेवा समिति के तत्वाधान में विगत 3 जनवरी से आयोजित की जा रही श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन श्रीमद्भागवत का रसपान पाने के लिए कथा स्थल पर भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। कथा के सातवें और अंतिम दिन कथा व्यास पं. प्रदीप कृष्ण भारद्वाज ने सुदामा चरित्र प्रसंग का विस्तृत वर्णन किया, जिसे सुनकर श्रोता भाव-विभोर हो गए।
श्रीमद् भागवत कथा का समापन सुदामा चरित्र की करुणा और परीक्षित मोक्ष के भावपूर्ण प्रसंग के साथ हुआ। कथा के अंतिम दिवस श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति रही। आचार्य द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रसंगों ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया, वहीं भक्ति और वैराग्य का संदेश कथा के माध्यम से जन-जन तक पहुंचा।
कथा श्रवण के दौरान श्रोतागण बार-बार तालियों से अपनी भावनाएं व्यक्त करते नजर आए। ग्राम वासियों एवं श्रद्धालुओं द्वारा कथा आयोजन के लिए उदार एवं सराहनीय आर्थिक सहयोग भी प्रदान किया गया, जिससे आयोजन को सफल बनाने में सहयोग मिला।

कार्यक्रम के दौरान कीबोर्डिस्ट हिमांशु भारद्वाज द्वारा प्रस्तुत किए गए उत्कृष्ट भजनों ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। उनके मधुर स्वर और भावपूर्ण प्रस्तुति पर श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो गए और पूरा पंडाल भक्ति रस में सराबोर हो उठा।
जहां कथा व्यास ने भगवान कृष्ण की विभिन्न लीलाओं का वर्णन किया गया। उन्होंने मां देवकी के छह पुत्रों को वापस लाने, सुभद्रा हरण के आख्यान और सुदामा चरित्र पर प्रकाश डाला। कथा व्यास ने सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए मित्रता निभाने के महत्व को समझाया।
उन्होंने बताया सुदामा जी के पास कृष्ण नाम का धन था। संसार की दृष्टि में गरीब तो थे, लेकिन दरिद्र नहीं थे। अपने जीवन में किसी से कुछ मांगा नहीं। पत्नी सुशीला के बार-बार कहने पर सुदामा अपने मित्र कृष्ण से मिलने गए। भगवान के पास जाकर भी कुछ नहीं मांगा। जहां भगवान अपने स्तर से सब कुछ दे देते हैं। सुदामा चरित्र के माध्यम से भक्तों के सामने दोस्ती की मिसाल पेश की और समाज में समानता का संदेश दिया। पं. प्रदीप कृष्ण ने बताया कि जब सुदामा अपनी पत्नी के आग्रह पर अपने मित्र भगवान श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका पहुंचे।

द्वारिकाधीश के महल का पता पूछकर सुदामा महल की ओर बढ़े, जहां द्वारपालों ने उन्हें भिक्षा मांगने वाला समझकर रोक दिया। सुदामा ने स्वयं को कृष्ण का मित्र बताया, जिसके बाद द्वारपाल ने महल में जाकर प्रभु को सूचना दी। जैसे ही द्वारपाल के मुख से सुदामा का नाम सुना, भगवान श्रीकृष्ण ‘सुदामा, सुदामा’ कहते हुए तेजी से द्वार की ओर भागे। सामने अपने सखा सुदामा को देखकर उन्होंने उन्हें अपने सीने से लगा लिया। सुदामा ने भी ‘कन्हैया, कन्हैया’ कहकर उन्हें गले लगाया। प्रभु कृष्ण सुदामा को अपने महल में ले गए और उनका अभिनंदन किया। इस भावुक दृश्य को देखकर श्रोता भाव-विभोर हो गए और उन्होंने सुदामा-कृष्ण की झांकी पर फूलों की वर्षा की।
श्रीमद्भागवत कथा का समापन करते हुए कई कथाओं का भक्तों को श्रवण करवाया, जिसमें प्रभु कृष्ण के 16108 शादियों के प्रसंग के साथ, सुदामा प्रसंग और परीक्षित मोक्ष की कथाएं सुनाई। इसके उपरांत दत्तात्रेय जी के चौबीस गुरुओं के बारे में बताया।
कथा समापन पर आयोजकों ने पूजा पाठ एवं यज्ञ आचार्य रोहित भारद्वाज एवं रवि भारद्वाज, कीबोर्डिस्ट एवं उत्कृष्ट भजन गायक हिमांशु भारद्वाज, पैड़ संचालक विशेष ठाकुर एवं ढोलक पर मौजूद रहे मणि गुप्ता आदि का हार्दिक आभार व्यक्त किया।
जहां कथा व्यास, आचार्य एवं समस्त संचालकों ने उपस्थित श्रद्धालुओं से धर्म, भक्ति व सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लेने का आह्वान किया। तदुपरांत शिव मंदिर कृतिया के महंत जयवीर गिरी जी एवं अन्य आयोजकों द्वारा प्रसाद वितरण किया गया। जहां शनिवार को भव्य भंडारे का भी आयोजन किया जाएगा।
इस अवसर पर समिति के सदस्यों सहित सैकड़ों गणमान्य भक्तगण मौजूद रहे।

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